ग्रामीणों को हाईकोर्ट से झटका, कोयला खनन परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहण को चुनौती देने वाली याचिकाएं खारिज

कोयला खनन परियोजना के लिए कोल बेयरिंग क्षेत्र (अधिग्रहण एवं विकास) अधिनियम, 1957 के प्रावधानों के तहत भूमि का अधिग्रहण किया गया है, जिसे पांच गांव के ग्रामीणों ने चुनौती दी थी। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि अदालत का दरवाजा खटखटाने में ज्यादा देरी के अलावा, इन याचिकाओं में कोई योग्यता नहीं होने के कारण, याचिकाएं खारिज करने योग्य हैं।

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के फैसले से बुधवार को सूरजपुर और सरगुजा जिले के पांच गांवों के ग्रामीणों बड़ा झटका लगा। हाईकोर्ट ने राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड (आरआरवीयूएनएल) को 1957 के अधिनियम के तहत आवंटित राज्य के सूरजपुर और सरगुजा जिलों में फैले परसा कोल ब्लॉक में खनन और भूमि अधिग्रहण के खिलाफ ग्रामीणों की याचिकाओं को खारिज कर दिया।

कोयला खनन परियोजना के लिए कोल बेयरिंग क्षेत्र (अधिग्रहण एवं विकास) अधिनियम, 1957 के प्रावधानों के तहत भूमि का अधिग्रहण किया गया है, जिसे पांच गांव के ग्रामीणों ने चुनौती दी थी।

मामले की सुनवाई हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश अरूप कुमार गोस्वामी और न्यायमूर्ति राजेंद्र चौहान सिंह सामंत की खंडपीठ ने की। अदालत ने अपने आदेश में कहा, “अदालत का दरवाजा खटखटाने में ज्यादा देरी के अलावा, इन याचिकाओं में कोई योग्यता नहीं होने के कारण, याचिकाएं खारिज करने योग्य हैं, इसलिए इन्हें खारिज किया जाता है।”

प्रतिवादी (आरआरवीयूएनएल) के लिए 1957 अधिनियम के तहत परसा कोयला ब्लॉक के लिए भूमि अधिग्रहण को चुनौती देने वाली पांच याचिकाएं तारा, जनार्दनपुर (सूरजपुर जिला) और फतेहपुर, घाटबारा, हरिहरपुर, साल्ही (सरगुजा जिला) के ग्रामीणों द्वारा दायर की गई थीं।

याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान, आरआरवीयूएनएल और परसा केंटे कोलियरीज लिमिटेड के वरिष्ठ वकील डॉ एनके शुक्ला ने बताया कि अन्य गतिविधियों के अलावा, बुनियादी ढांचे के सहायक उपयोग और अधिभार (ओवर बर्डन) डंप क्षेत्र के लिए गैर-कोयला वाली भूमि की आवश्यकता होती है।

उन्होंने कहा, “कोल बेयरिंग (सीबी) अधिनियम के तहत भूमि का अधिग्रहण 2013 के अधिनियम की चौथी अनुसूची की धारा 105 (मुआवजे, पुनर्वास और पुनर्स्थापन से संबंधित) के मद्देनजर 2013 के अधिनियम द्वारा नियंत्रित या अधिक्रमित नहीं है।” .

हालांकि, शुक्ला ने कहा 2015 में दिए गए भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन की कठिनाइयों को दूर करने के आदेश, उचित मुआवजे और पारदर्शिता के अधिकार की घोषणा के मद्देनजर, 2013 के अधिनियम के प्रावधान कोल बेयरिंग अधिनियम पर लागू होंगे।

विस्तार

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के फैसले से बुधवार को सूरजपुर और सरगुजा जिले के पांच गांवों के ग्रामीणों बड़ा झटका लगा। हाईकोर्ट ने राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड (आरआरवीयूएनएल) को 1957 के अधिनियम के तहत आवंटित राज्य के सूरजपुर और सरगुजा जिलों में फैले परसा कोल ब्लॉक में खनन और भूमि अधिग्रहण के खिलाफ ग्रामीणों की याचिकाओं को खारिज कर दिया।

कोयला खनन परियोजना के लिए कोल बेयरिंग क्षेत्र (अधिग्रहण एवं विकास) अधिनियम, 1957 के प्रावधानों के तहत भूमि का अधिग्रहण किया गया है, जिसे पांच गांव के ग्रामीणों ने चुनौती दी थी।

मामले की सुनवाई हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश अरूप कुमार गोस्वामी और न्यायमूर्ति राजेंद्र चौहान सिंह सामंत की खंडपीठ ने की। अदालत ने अपने आदेश में कहा, “अदालत का दरवाजा खटखटाने में ज्यादा देरी के अलावा, इन याचिकाओं में कोई योग्यता नहीं होने के कारण, याचिकाएं खारिज करने योग्य हैं, इसलिए इन्हें खारिज किया जाता है।”

प्रतिवादी (आरआरवीयूएनएल) के लिए 1957 अधिनियम के तहत परसा कोयला ब्लॉक के लिए भूमि अधिग्रहण को चुनौती देने वाली पांच याचिकाएं तारा, जनार्दनपुर (सूरजपुर जिला) और फतेहपुर, घाटबारा, हरिहरपुर, साल्ही (सरगुजा जिला) के ग्रामीणों द्वारा दायर की गई थीं।

याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान, आरआरवीयूएनएल और परसा केंटे कोलियरीज लिमिटेड के वरिष्ठ वकील डॉ एनके शुक्ला ने बताया कि अन्य गतिविधियों के अलावा, बुनियादी ढांचे के सहायक उपयोग और अधिभार (ओवर बर्डन) डंप क्षेत्र के लिए गैर-कोयला वाली भूमि की आवश्यकता होती है।

उन्होंने कहा, “कोल बेयरिंग (सीबी) अधिनियम के तहत भूमि का अधिग्रहण 2013 के अधिनियम की चौथी अनुसूची की धारा 105 (मुआवजे, पुनर्वास और पुनर्स्थापन से संबंधित) के मद्देनजर 2013 के अधिनियम द्वारा नियंत्रित या अधिक्रमित नहीं है।” .

हालांकि, शुक्ला ने कहा 2015 में दिए गए भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन की कठिनाइयों को दूर करने के आदेश, उचित मुआवजे और पारदर्शिता के अधिकार की घोषणा के मद्देनजर, 2013 के अधिनियम के प्रावधान कोल बेयरिंग अधिनियम पर लागू होंगे।

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