साल बाद खत्म होगा राममंदिर की शिलाओं का इंतजार

अयोध्या। पांच सौ साल के संघर्ष के बाद जिस घड़ी का इंतजार करोड़ों राम भक्तों को था वह शुभ घड़ी आने वाली है। एक जून 2022 की तिथि रामनगरी के इतिहास के पन्नों में दर्ज होगी, क्योंकि इसी दिन से भगवान श्रीराम के चिरप्रतीक्षित घर (गर्भगृह) का निर्माण शुरू होने जा रहा है।

एक जून को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ धार्मिक अनुष्ठानों के मध्य जब रामलला के गर्भगृह की पहली शिला रखेंगे तो न सिर्फ रामभक्तों का चिर स्वप्न पूरा होगा बल्कि गर्भगृह के लिए तैयार राममंदिर की शिलाओं (पत्थर) का भी इंतजार खत्म होगा।

मुख्यमंत्री 1990 में शुरू हुई राममंदिर की कार्यशाला में तराशी गई शिला का पूजन कर गर्भगृह निर्माण का शुभारंभ करेंगे। गर्भगृह के जिन पत्थरों का पूजन के बाद मंदिर में संयोजन शुरू होगा, उन पत्थरों ने भी मंदिर निर्माण के लिए लंबा इंतजार सहा है।

राममंदिर निर्माण को लेकर मंदिर आंदोलन के साथ पत्थर तराशी का कार्य सितंबर 1990 में दो कारीगरों ने प्रारंभ किया था। उस समय मंदिर आंदोलन उभार पर तो था किंतु मंदिर निर्माण की संभावना दूर की कौड़ी थी।
इसके बावजूद मंदिर आंदोलन के अग्रदूत संतों और विहिप नेतृत्व ने मंदिर निर्माण के लिए रामजन्मभूमि से करीब डेढ़ किलोमीटर के फासले पर मंदिर निर्माण कार्यशाला शुरू की।

इस दौरान एक लाख 75 हजार घन फीट पत्थरों को राजस्थान के वंशीपहाड़पुर से अयोध्या लाने का कार्य शुरू हुआ। 1992 की घटना के बाद कुछ दिनों तक काम रोकना पड़ा। उसके बाद फिर तेज गति से पत्थर तराशी का कार्य शुरू हुआ और 1995 में बड़ी संख्या में कारीगरों को लगाया गया, लेकिन 10 सितंबर 2010 में आए हाईकोर्ट के फैसले के बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

जिसके बाद काम की गति भी धीमी हो गई। 2014 में केंद्र में मोदी की सरकार बनते ही फिर कार्य शुरू हुआ। इस दौरान लगभग 15 कारीगर 2018 तक कार्य करते रहे, लेकिन मुख्य कारीगर की तबीयत खराब होने के कारण कार्य बंद हो गया।

जिसके बाद 2019 में लगातार सुनवाई के कारण कार्य को रोक दिया गया। इस सब के बीच मंदिर निर्माण के लिए पत्थर तराशी का 70 प्रतिशत कार्य पूरा हो चुका है।

पूर्व प्रस्तावित मंदिर में पौने दो लाख घन फीट पत्थर प्रयुक्त होना था और करीब एक लाख घन फीट शिलाओं की तराशी हो चुकी थी, लेकिन प्रस्तावित मंदिर के आकार में वृद्धि के साथ परिदृश्य बदल गया।
आकार वृद्धि के बाद प्रस्तावित मंदिर पूर्व की अपेक्षा 212 के बजाए 318 स्तंभों व पूर्व के एक मुख्य शिखर व दो उपशिखर की जगह एक मुख्य शिखर व पांच उपशिखर एवं पूर्व प्रस्तावित मंदिर के आकार की अपेक्षा करीब पौने दो गुना (161 फीट ऊंचे, 360 फीट लंबे एवं 235 फीट चौड़े) बड़े मंदिर के लिए करीब चार लाख घन फीट शिलाओं की तराशी होनी है।
गर्भगृह के लिए अभी 70 प्रतिशत पत्थर तैयार हैं। बदले आकार के अनुसार शेष पत्थरों की नक्काशी व तराशी का कार्य अयोध्या सहित राजस्थान की चार कार्यशालाओं में संचालित है।

गर्भगृह का निर्माण शुरू होने के साथ ही राममंदिर के पत्थरों की भी तीन दशक की साध पूरी होगी। इन पत्थरों ने तीन दशक से खुले आसमान के नीचे मंदिर निर्माण के इंतजार में मौसम की मार झेली। राममंदिर के हक में निर्णय आने के बाद ट्रस्ट द्वारा इन पत्थरों की सफाई कराकर इन्हें चमकाया गया। गर्भगृह के लिए जो पत्थर तैयार हैं। उन्हें रामजन्मभूमि में पहले ही शिफ्ट कराया जा चुका है। इन्हीं पत्थरों से गर्भगृह का निर्माण शुरू होगा। – शरद शर्मा, प्रांतीय मीडिया प्रभारी, विश्व हिंदू परिषद

अयोध्या। पांच सौ साल के संघर्ष के बाद जिस घड़ी का इंतजार करोड़ों राम भक्तों को था वह शुभ घड़ी आने वाली है। एक जून 2022 की तिथि रामनगरी के इतिहास के पन्नों में दर्ज होगी, क्योंकि इसी दिन से भगवान श्रीराम के चिरप्रतीक्षित घर (गर्भगृह) का निर्माण शुरू होने जा रहा है।

एक जून को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ धार्मिक अनुष्ठानों के मध्य जब रामलला के गर्भगृह की पहली शिला रखेंगे तो न सिर्फ रामभक्तों का चिर स्वप्न पूरा होगा बल्कि गर्भगृह के लिए तैयार राममंदिर की शिलाओं (पत्थर) का भी इंतजार खत्म होगा।

मुख्यमंत्री 1990 में शुरू हुई राममंदिर की कार्यशाला में तराशी गई शिला का पूजन कर गर्भगृह निर्माण का शुभारंभ करेंगे। गर्भगृह के जिन पत्थरों का पूजन के बाद मंदिर में संयोजन शुरू होगा, उन पत्थरों ने भी मंदिर निर्माण के लिए लंबा इंतजार सहा है।

राममंदिर निर्माण को लेकर मंदिर आंदोलन के साथ पत्थर तराशी का कार्य सितंबर 1990 में दो कारीगरों ने प्रारंभ किया था। उस समय मंदिर आंदोलन उभार पर तो था किंतु मंदिर निर्माण की संभावना दूर की कौड़ी थी।

इसके बावजूद मंदिर आंदोलन के अग्रदूत संतों और विहिप नेतृत्व ने मंदिर निर्माण के लिए रामजन्मभूमि से करीब डेढ़ किलोमीटर के फासले पर मंदिर निर्माण कार्यशाला शुरू की।

इस दौरान एक लाख 75 हजार घन फीट पत्थरों को राजस्थान के वंशीपहाड़पुर से अयोध्या लाने का कार्य शुरू हुआ। 1992 की घटना के बाद कुछ दिनों तक काम रोकना पड़ा।

उसके बाद फिर तेज गति से पत्थर तराशी का कार्य शुरू हुआ और 1995 में बड़ी संख्या में कारीगरों को लगाया गया, लेकिन 10 सितंबर 2010 में आए हाईकोर्ट के फैसले के बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

जिसके बाद काम की गति भी धीमी हो गई। 2014 में केंद्र में मोदी की सरकार बनते ही फिर कार्य शुरू हुआ। इस दौरान लगभग 15 कारीगर 2018 तक कार्य करते रहे, लेकिन मुख्य कारीगर की तबीयत खराब होने के कारण कार्य बंद हो गया।

जिसके बाद 2019 में लगातार सुनवाई के कारण कार्य को रोक दिया गया। इस सब के बीच मंदिर निर्माण के लिए पत्थर तराशी का 70 प्रतिशत कार्य पूरा हो चुका है।

पूर्व प्रस्तावित मंदिर में पौने दो लाख घन फीट पत्थर प्रयुक्त होना था और करीब एक लाख घन फीट शिलाओं की तराशी हो चुकी थी, लेकिन प्रस्तावित मंदिर के आकार में वृद्धि के साथ परिदृश्य बदल गया।

आकार वृद्धि के बाद प्रस्तावित मंदिर पूर्व की अपेक्षा 212 के बजाए 318 स्तंभों व पूर्व के एक मुख्य शिखर व दो उपशिखर की जगह एक मुख्य शिखर व पांच उपशिखर एवं पूर्व प्रस्तावित मंदिर के आकार की अपेक्षा करीब पौने दो गुना (161 फीट ऊंचे, 360 फीट लंबे एवं 235 फीट चौड़े) बड़े मंदिर के लिए करीब चार लाख घन फीट शिलाओं की तराशी होनी है।

गर्भगृह के लिए अभी 70 प्रतिशत पत्थर तैयार हैं। बदले आकार के अनुसार शेष पत्थरों की नक्काशी व तराशी का कार्य अयोध्या सहित राजस्थान की चार कार्यशालाओं में संचालित है।

गर्भगृह का निर्माण शुरू होने के साथ ही राममंदिर के पत्थरों की भी तीन दशक की साध पूरी होगी। इन पत्थरों ने तीन दशक से खुले आसमान के नीचे मंदिर निर्माण के इंतजार में मौसम की मार झेली। राममंदिर के हक में निर्णय आने के बाद ट्रस्ट द्वारा इन पत्थरों की सफाई कराकर इन्हें चमकाया गया। गर्भगृह के लिए जो पत्थर तैयार हैं। उन्हें रामजन्मभूमि में पहले ही शिफ्ट कराया जा चुका है। इन्हीं पत्थरों से गर्भगृह का निर्माण शुरू होगा। – शरद शर्मा, प्रांतीय मीडिया प्रभारी, विश्व हिंदू परिषद

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